ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम मानव रक्त को वर्गीकृत करने का एक तरीका है, जो लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells - RBCs) की सतह पर पाए जाने वाले A और B एंटीजन (antigens) की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर आधारित है। इस सिस्टम की खोज कार्ल लैंडस्टीनर (Karl Landsteiner) ने 1901 में की थी, जिसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला।
ABO सिस्टम ब्लड ट्रांसफ्यूजन में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बेमेल (incompatible) रक्त चढ़ाने से गंभीर, जानलेवा प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि A और B एंटीजन के खिलाफ एंटीबॉडी (जिन्हें आइसोएग्लूटिनिन - isoagglutinins भी कहा जाता है) स्वाभाविक रूप से उन व्यक्तियों के प्लाज्मा (plasma) में मौजूद होते हैं, जिनकी लाल रक्त कोशिकाओं में वह विशिष्ट एंटीजन नहीं होता। उदाहरण के लिए:
अगर किसी व्यक्ति को गलत ब्लड ग्रुप का रक्त चढ़ाया जाता है (जैसे, ग्रुप B वाले व्यक्ति को ग्रुप A का रक्त), तो उसके प्लाज्मा में मौजूद एंटीबॉडीज, दान किए गए रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे वे कोशिकाएं फट जाती हैं (hemolysis)। यह एक्यूट हीमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन (acute hemolytic transfusion reaction) कहलाता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जैसे सदमा (shock), गुर्दे की विफलता (renal failure), और DIC (Disseminated Intravascular Coagulation)।
ABO ब्लड ग्रुप सिस्टम में:
एंटीबॉडीज का बनना: ये एंटीबॉडीज जीवन के पहले कुछ वर्षों में बनती हैं, पर्यावरणीय पदार्थों (जैसे भोजन, बैक्टीरिया, वायरस) के संपर्क में आने से, जिनमें A और B एंटीजन के समान संरचनाएं (epitopes) होती हैं। उदाहरण के लिए, एंटी-A एंटीबॉडीज इन्फ्लूएंजा वायरस (influenza virus) के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (immune response) से उत्पन्न हो सकती हैं, क्योंकि इसके epitopes, A ग्लाइकोप्रोटीन पर α-D-N-galactosamine के समान होते हैं। शिशुओं में, ये एंटीबॉडी 3-6 महीने की उम्र के बाद पता लगाने योग्य स्तर तक पहुँच जाती हैं।
ABO ब्लड टाइप एक एकल जीन (ABO जीन) द्वारा नियंत्रित होता है, जो क्रोमोसोम 9 (chromosome 9) पर स्थित होता है। इस जीन के तीन मुख्य एलील (alleles) होते हैं: IA, IB, और i.
IA और IB एलील, i एलील पर प्रभावी (dominant) होते हैं, और IA और IB एक-दूसरे के साथ सह-प्रभावी (co-dominant) होते हैं। इसका मतलब है:
जीनोटाइप (Genotype): एक व्यक्ति को प्रत्येक माता-पिता से एक एलील मिलता है, जिससे छह संभावित जीनोटाइप बनते हैं:
फेनोटाइप (Phenotype): ये जीनोटाइप चार संभावित फेनोटाइप (ब्लड ग्रुप) उत्पन्न करते हैं:
बॉम्बे ब्लड ग्रुप (जिसे hh या Oh फेनोटाइप भी कहा जाता है) एक अत्यंत दुर्लभ ब्लड टाइप है। इसकी खोज सबसे पहले 1952 में मुंबई (तब बॉम्बे) में डॉ. वाई. एम. भेंडे (Dr. Y. M. Bhende) ने की थी।
ABO सिस्टम से भिन्नता: बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों में लाल रक्त कोशिकाओं पर H एंटीजन नहीं होता, जो A और B एंटीजन का पूर्ववर्ती (precursor) है। इसका मतलब है कि भले ही उनमें A और/या B एलील मौजूद हों, वे A या B एंटीजन नहीं बना पाते। इसके अलावा, उनके सीरम (serum) में एंटी-H एंटीबॉडीज (anti-H antibodies) होती हैं, जो न केवल A, B और AB ब्लड ग्रुप, बल्कि O ब्लड ग्रुप की लाल रक्त कोशिकाओं पर भी प्रतिक्रिया करती हैं (क्योंकि O ब्लड ग्रुप में H एंटीजन होता है)।
आनुवंशिकी (Genetics): बॉम्बे फेनोटाइप H जीन (FUT1 जीन) के दो अप्रभावी (recessive) एलील (अर्थात, hh जीनोटाइप) विरासत में मिलने के कारण होता है। FUT1 जीन एक फ्यूकोसिलट्रांसफेरेज (fucosyltransferase) एंजाइम को कोड करता है, जो H एंटीजन के संश्लेषण (synthesis) में अंतिम चरण को उत्प्रेरित (catalyze) करता है। बॉम्बे फेनोटाइप में, यह एंजाइम निष्क्रिय (inactive) होता है, इसलिए H एंटीजन नहीं बन पाता।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों के लिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे केवल बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों से ही रक्त प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें ABO सिस्टम के किसी भी अन्य ब्लड ग्रुप (A, B, AB, या O) का रक्त नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उनके सीरम में मौजूद एंटी-H एंटीबॉडीज, दाता (donor) की लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला कर देंगी, जिससे गंभीर हीमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन (hemolytic transfusion reaction) होगा।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप अत्यंत दुर्लभ है (भारत में लगभग 10,000 में से 1 व्यक्ति में, और यूरोप में 10 लाख में से 1 व्यक्ति में पाया जाता है), इसलिए बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले डोनर को खोजना बहुत मुश्किल होता है।
पैरा-बॉम्बे फेनोटाइप (Para-Bombay Phenotype): यह बॉम्बे फेनोटाइप का एक और भी दुर्लभ प्रकार है। इसमें, व्यक्तियों में RBCs पर ABH एंटीजन की अभिव्यक्ति (expression) नहीं होती, लेकिन शरीर के स्रावों (secretions) में ABH एंटीजन की कुछ अभिव्यक्ति हो सकती है। ऐसा FUT1 जीन में उत्परिवर्तन (mutation) के कारण होता है, लेकिन FUT2 जीन (जो स्रावों में H एंटीजन बनाता है) क्रियाशील रहता है। पैरा-बॉम्बे वाले व्यक्तियों में भी एंटी-H एंटीबॉडीज बन सकती हैं, इसलिए उन्हें ट्रांसफ्यूजन के मामले में बॉम्बे फेनोटाइप वाले व्यक्तियों की तरह ही माना जाना चाहिए।
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